अष्टभुजाधारी, सिंह वाहिनी मां कूष्मांडा आपके जीवन के सभी कष्टों का अंत कर सुख-समृद्धि लाएं। नवरात्रि के चौथे दिन की हार्दिक शुभकामनाएं!”
मां कूष्मांडा का स्वरूप और महत्व
- सृष्टि की रचनाकार: मान्यता है कि जब चारों ओर अंधकार और शून्य था, तब मां ने अपनी हल्की सी मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी।
- अष्टभुजाधारी: मां कूष्मांडा की आठ भुजाएं हैं, जिनमें कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृत कलश, चक्र, गदा और जपमाला सुशोभित हैं। इनका वाहन सिंह (शेर) है।
- सूर्य मंडल में निवास: देवी का तेज और प्रकाश सूर्य के समान है, इसलिए इनका निवास सूर्य मंडल के भीतर माना जाता है।
- आशीर्वाद: इनकी पूजा से भक्तों के सारे कष्ट दूर होते हैं तथा यश, बल, स्वास्थ्य और आयु की प्राप्ति होती है।
चौथे दिन की पूजा विधि और प्रसाद
- प्रिय भोग: मां कूष्मांडा को कुम्हड़ा (कद्दू) या उससे बनी मिठाई का भोग लगाना बहुत शुभ माना जाता है।
- रंग: इस दिन राजसी नीला (Royal Blue) या नारंगी रंग पहनना शुभ माना जाता है।
- मंत्र:
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
मां कूष्मांडा की व्रत कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और चारों ओर केवल घोर अंधकार छाया हुआ था, तब इस चराचर जगत की रचना मां कूष्मांडा ने की थी। उन्होंने अपनी मंद और हल्की मुस्कान (ईषत् हास्य) से ब्रह्मांड रूपी अंडे को उत्पन्न किया। इसी कारण इन्हें सृष्टि की आदिस्वरूपा या आदिशक्ति कहा जाता है। मां का तेज इतना अधिक है कि वे सूर्यलोक के भीतर निवास करती हैं और केवल उन्हीं में सूर्य के तेज को सहने की शक्ति है। इनकी आठ भुजाएं हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है।
पूजा विधि (Puja Vidhi)
- स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-स्वच्छ (संभव हो तो नीले या नारंगी रंग के) वस्त्र धारण करें。
- कलश व माता की पूजा: पूजा स्थल पर दीप जलाएं। सबसे पहले कलश और गणेश जी की पूजा करें। इसके बाद मां कूष्मांडा को कुमकुम, अक्षत, धूप, गंध और लाल फूल अर्पित करें।
- शृंगार सामग्री: माता को सौभाग्य का सामान (सुहाग सामग्री) और हरी चूड़ियां चढ़ाना बेहद शुभ माना जाता है
मुख्य मंत्र (Mantra)
पूजा के दौरान शांत मन से इन मंत्रों का जाप करें:
- सरल पूजा मंत्र:
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥ - बीज मंत्र:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्माण्डायै नमः॥ - स्तुति मंत्र:
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥
मां कूष्मांडा की आरती (Aarti)
कूष्मांडा जय जग सुखदानी। मुझ पर दया करो महारानी॥
पिगंला ज्वालामुखी निराली। शाकंबरी मां भोली भाली॥लाखों नाम निराले तेरे। भक्त कई मतवाले तेरे॥
भीमा पर्वत पर है डेरा। स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥सबकी सुनती हो जगदंबे। सुख पहुंचती हो मां अंबे॥
तेरे दर्शन का मैं प्यासा। पूर्ण कर दो मेरी आशा॥मां के मन में ममता भारी। क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥
तेरे दर पर किया है डेरा। दूर करो मां संकट मेरा॥मेरे कारज पूरे कर दो। मेरे तुम भंडारे भर दो॥
तेरा दास तुझे ही ध्याए। भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥
मां कूष्मांडा का कवच पाठ (Kavach Path) बेहद शक्तिशाली माना जाता है। मान्यता है कि इसका नियमित पाठ करने से मनुष्य के जीवन से हर प्रकार का भय, रोग, शोक और नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं।
यहाँ माँ कूष्मांडा का संपूर्ण कवच पाठ दिया गया है:
🛡️ माँ कूष्मांडा कवच पाठ
विनियोग
ॐ अस्य श्री कूष्माण्डा कवचस्य, ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्री कूष्माण्डा देवता, श्रीं बीजं, ह्रीं शक्तिः, कीलकं, सर्व कार्य सिद्धयर्थे जपे विनियोगः॥
कवच मूल पाठ
हंसै में शिर पातु कुष्माण्डा भवनाशिनी।
हास्यं नभ ललाटं च पातु मां कूष्माण्डे कल्याणी॥नेत्रे च वाम-दक्षिणे पातु मां योग-योगिनी।
कौमारी मुखं पातु मां कण्ठं कुरु कुरु स्वाहा॥ह्रीं ह्रीं पातु मे स्कन्धं बाहू मे सर्व-धारिणी।
हृदयं पातु मे देवी महा-योग-प्रदायिनी॥नाभिं स्तनं च पातु मां कटि देशे च सर्वदा।
कौमारी पातु मे गुह्यं ऊरू मे पातु देवी महाबला॥जंघे पातु मे कूर्माक्षी पातु मे पाद-युग्मकम्।
सर्वांगं पातु मे देवी कल्याणी कूष्माण्डा शुभ-प्रदा॥कवच पाठ के नियम और लाभ
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- उच्चारण: पाठ करते समय हर शब्द का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए।
- समय: माता की पूजा (धूप, दीप, और मालपुए का भोग लगाने) के तुरंत बाद और आरती से पहले इस कवच का पाठ करें।
- लाभ: यह कवच साधक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच (सुरक्षा घेरा) बनाता है, जिससे मानसिक तनाव दूर होता है और अनाहत चक्र जाग्रत होता है।



