ईरान संकट की वजह से कुछ एक्सपर्ट ने यह कयास लगाने शुरू कर दिए थे कि रिजर्व बैंक रुपये की गिरावट को थामने के लिए कर्ज की ब्याज दरें बढ़ा सकता है. फिलहाल भारत का केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी को रुपये की गिरावट रोकने का सबसे अच्छा तरीका नहीं मानता है. आरबीआई का यह रुख बाजार की सोच से अलग है और यह स्पष्ट करता है कि मौद्रिक नीति में उधारी की लागत तय करने में महंगाई, न कि मुद्रा मुख्य भूमिका निभाएगी.
आरबीआई के विचार से परिचित सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय बैंक के पास अभी भी कई विकल्प हैं जिन्हें वह आजमा सकता है. इनमें प्रवासी भारतीयों के लिए डॉलर डिपॉजिट स्कीम और कर्ज निवेशकों के लिए टैक्स में बदलाव जैसे विकल्प शामिल हैं. एक सूत्र ने बताया कि सभी विकल्प खुले हैं और सरकार के साथ मिलकर विचार किया जा रहा है. केंद्रीय बैंक को फिलहाल ब्याज दरें बढ़ाने की कोई तात्कालिक जरूरत नहीं दिख रही है. यह आम आदमी के लिए राहत भरी खबर है.
कर्ज महंगा न होने से राहत
आरबीआई का यह रुख नीति निर्माताओं को बाजार की उस सोच से अलग करता है जिसमें सख्ती की उम्मीद की जा रही है. ईरान संघर्ष के कारण ऊर्जा कीमतों में उछाल से रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है. हालांकि, महंगाई अभी भी नियंत्रण में है और अधिकारियों को डर है कि दरें बढ़ाने से मुद्रा को स्थिर करने में ज्यादा मदद नहीं मिलेगी, बल्कि एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की पहले से धीमी हो रही विकास दर को और नुकसान हो सकता है. इंडोनेशिया और फिलीपींस ने महंगाई और मुद्रा के कमजोर होने के जोखिम को देखते हुए दरें बढ़ाई हैं, लेकिन इसका ज्यादा लाभ नहीं दिख रहा है.



