रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने लॉन्ग रेंज हाइपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइल (LR-AShM) के दूसरे चरण का सफल परीक्षण किया है. एक्सपर्ट मानते हैं कि इस मिसाइल के इंडियन नेवी में शामिल होने से इंडियन नेवी की ताकत में कई गुना तक का ईजाफा होगा. समंदर में राष्ट्रीय हितों का रक्षा करना पहले क मुकाबले और बेहतर होगा. भारत ने LR-AShM का परीक्षण ऐसे समय में किया है, जब मैरीटाइम सिक्योरिटी को लेकर गंभीर चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं. ईरान जंग ने समुद्री सुरक्षा के मुद्दे को और भी गंभीर बना दिया है. दूसरी तरफ, हिन्द महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों ने पहले से ही भारत की चिंताएं बढ़ा रखी हैं. ऐसे में भारत के लिए मैरीटाइम सिक्योरिटी को मजबूत करना काफी जरूरी हो गया. LR-AShM का सफल ट्रायल इस लिहाज से काफी अहम है. इससे समंदर में भारत की सामरिक ताकत काफी बढ़ेगी. भारत के भंडार में कई ऐसी मिसाइलें हैं, जो मारक क्षमता के मामले में काफी खतरनाक हैं. अग्नि-5 और ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलें उसी कैटेगरी में आते हैं. अब सवाल उठता है कि LR-AShM ब्रह्मोस और अग्नि-5 के मुकाबले में कहां ठहरती हैं. इन तीनों मिसाइलों में कौन सबसे ज्यादा खतरनाक है.
भारत ने रक्षा क्षमताओं में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए लंबी दूरी की एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल सिस्टम का सफल परीक्षण किया है. DRDO द्वारा ओडिशा तट के पास स्थित एक रक्षा केंद्र से इस मिसाइल के फेज-II का परीक्षण किया गया, जो देश की अगली पीढ़ी की स्ट्राइक क्षमता की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है. परीक्षण के दौरान मिसाइल ने लगभग 1500 किलोमीटर दूर स्थित लक्ष्य को सटीकता से भेदते हुए अपनी क्षमता साबित की. यह मिसाइल टू-फेज हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल टेक्नोलॉजी पर आधारित है, जो इसे अत्यधिक गति और उच्च मारक क्षमता प्रदान करती है. ट्रायल में सभी मानकों का पालन किया गया. यह मिसाइल खास तौर पर Indian Navy की तटीय सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विकसित की गई है और यह स्थिर व गतिशील समुद्री लक्ष्यों यानी मूविंग टार्गेट को निशाना बनाने में सक्षम है. स्वदेशी एवियोनिक्स और अत्याधुनिक सेंसर सिस्टम इसकी सटीकता और विश्वसनीयता को और बढ़ाते हैं. मिसाइल प्रारंभिक चरण में मैक-10 (12350 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार) तक की गति हासिल करती है और बाद में नियंत्रित ग्लाइड मोड में मैक 5 (6200 KMPH) की औसत गति से उड़ान भरती है. यह उपलब्धि भारत को हाइपरसोनिक तकनीक वाले चुनिंदा देशों की श्रेणी में और मजबूती से स्थापित करती है. साथ ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी सामरिक स्थिति और समुद्री सुरक्षा को भी सुदृढ़ करती है.



