होर्मुज जलडमरूमध्य में शनिवार को भारतीय जहाज पर फायरिंग की गई. भारतीय जहाज पर गनबोट से अटैक होना सिर्फ समुद्री तनाव नहीं, बल्कि ईरान के भीतर चल रही सत्ता की जंग का नतीजा माने जा रहे हैं. को भारतीय खुफिया सूत्रों ने बताया, भारतीय टैंकरों के पास हुई ‘वॉर्निंग फायरिंग’ दरअसल ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची की कूटनीतिक लाइन के खिलाफ सेना की सीधी चुनौती थी. बताया जा रहा है कि ईरान के भीतर इस वक्त सत्ता का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है. US-इजरायल हमले में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद वहां एक बड़ा नेतृत्व शून्य पैदा हो गया है, जिससे पूरा सिस्टम अस्थिर हो गया है.
सेना अपने ही विदेश मंत्रालय के खिलाफ क्यों?
इसी अस्थिरता के बीच ईरान की सबसे ताकतवर सैन्य संस्था IRGC और विदेश मंत्रालय आमने-सामने आ गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, IRGC प्रमुख अहमद वहिदी और उनकी टीम को लगता है कि विदेश मंत्री अराघची पश्चिमी देशों के साथ बातचीत में ‘जरूरत से ज्यादा नरम’ रुख अपना रहे हैं. IRGC का मानना है कि परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल सिस्टम और हिजबुल्लाह-हमास जैसे संगठनों से जुड़े फैसलों में कूटनीतिक नरमी देश के हितों के खिलाफ है. यही वजह है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने को लेकर विदेश मंत्रालय की लाइन को सेना ने खुले तौर पर चुनौती दी. IRGC से जुड़े मीडिया प्लेटफॉर्म ने भी अराघची के बयान की आलोचना की और इसे ‘खतरनाक झुकाव’ बताया. इस आंतरिक टकराव का सबसे बड़ा असर इस्लामाबाद में चल रही अमेरिका-ईरान बातचीत पर भी दिखा है.
IRGC के नाराजगी की क्या है असल वजह?
जानकारी के मुताबिक, IRGC चाहता है कि उसके करीबी अधिकारी मोहम्मद-बाकर जोलगदर को शांति से जुड़ी बातचीत टीम में शामिल किया जाए, ताकि पूरी वार्ता पर उसका सीधा नियंत्रण रहे. लेकिन विदेश मंत्री अराघची ने इसका विरोध किया है, यह कहते हुए कि जोलगदर के पास बातचीत का अनुभव नहीं है. इस खींचतान ने इस्लामाबाद की बातचीत को एक ‘तीन तरफा जंग’ बना दिया है- एक तरफ ईरानी कूटनीतिज्ञ, दूसरी तरफ IRGC के हार्डलाइनर और तीसरी तरफ बाहरी मध्यस्थ.



