जियोपॉलिटिक्स की बिसात पर आज एक ऐसा मंजर उभर रहा है जिसे देखकर दुनिया दंग है. कल तक जो अमेरिका ग्लोबल पुलिसमैन बनकर दुनिया को सुरक्षा की गारंटी देता था आज वही सुपरपावर एक कागजी शेर की तरह नजर आ रहा है. दक्षिण कोरिया सहमा हुआ है, जापान अपनी सुरक्षा की नई राहें तलाश रहा है और यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की आंखों में वह बेबसी साफ दिख रही है, जिसे वाशिंगटन की इस्तेमाल करो और छोड़ दो वाली नीति ने तोहफे में दिया है. ईरान जंग के बीच ट्रंप की जिद ने उन्हें अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगियों को उनके हाल पर छोड़ने पर मजबूर कर दिया है.
ईरान के सस्ते ड्रोन्स के सामने अमेरिका के अरबों डॉलर के THAAD सिस्टम का दम तोड़ना और रूस के तेल के आगे वाशिंगटन का सरेंडर करना इस बात की गवाही है कि अमेरिकी वर्चस्व का सूर्यास्त अब केवल समय की बात है. क्या हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहां वाशिंगटन की करीबी दोस्ती दुनिया का सबसे बड़ा जोखिम बन गई है? बीजिंग में बैठे शी जिनपिंग और मॉस्को में पुतिन के चेहरों पर आज मुस्कुराहट होगी. बिना एक भी गोली चलाए उनका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी खुद अपने ही अहंकार और बोझ तले दबता जा रहा है. यहां, भारत पर रूसी तेल छोड़ने का दबाव बनाने वाले ट्रंप अब खुद हमारे आगे गिड़गिड़ा रहे है कि कच्चे तेल की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए भारत रूस से तेल खरीद ले.
ईरान का जाल और THAAD की बर्बादी
अमेरिका इस वक्त ईरान और उसके प्रॉक्सी संगठनों के साथ एक बेहद महंगे और घाटे वाले युद्ध में उलझ गया है. ईरान ने अपनी रणनीति से अमेरिका की सैन्य अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है.



